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सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (हम अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं)

हम अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं 
आखिर कब तक हम ऐसा करें? जब तक यह शरीर कर्म कर सकता है। हम यह नहीं जानते कि यह कब काम करना बन्द कर देगा । महान संत परीक्षित महाराज को तो सात दिन की मोहलत मिली थी, “एक सप्ताह में तुम्हारा शरीर-पात हो जायेगा।” किन्तु हम नहीं जानते कि हमारा शरीर-पात कब हो जायेगा। हम जब भी सड़क पर होते हैं तो अकस्मात् दुर्घटना हो सकती है। हमें सदैव तैयार रहना चाहिए। मृत्यु सदैव उपस्थित रहती है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हर कोई मर रहा है किन्तु मैं तो जीवित रहुँगा । यदि हर कोई मरता है तो फिर आप क्यों जीवित रहेंगे? आपके बाबा मरे हैं, पर बाबा मरे हैं, अन्य सम्बन्धी गण भी मरे हैं तो फिर आप क्यों जीवित रहेंगे? आप भी मरेंगे। आपकी सन्तानें भी मरेंगी। अतएव इसके पूर्व कि मृत्यु आए, जब तक यह मानव बुद्धि है हम कृष्णभावनामृत में जुट जाएँ। प्रह्लाद महाराज की यही संस्तुति है। | हम नहीं जानते कि यह शरीर कब काम करना बन्द कर दे अतएव हमें तुरन्त ही कृष्णभावनामृत में प्रवृत्त होकर उसी के अनुसार कर्म करना चाहिए। “किन्तु यदि मैं तुरन्त कृष्णभावनामृत में लग जाऊं तो मेरी जीविका कैसे चलेगी?” इसकी व्यवस्था है। मुझे आपल्लोरों से अपने एक शिष्य के विश्वास के बारे में बताते हुए प्रसन्नता हो रही हैं। उससे असहमत शिष्य ने कहा, “तुम इसकी देखरेख नहीं करते कि प्रतिष्ठान को कैसे चलाया जाय।” इसपर उसने उत्तर दिया “अरे! कृष्ण सब पूरा करेंगे।” यह अति उत्तम विचार है। इसे सुनकर मैं हर्षित हुआ । यदि कुत्ते, बिल्ली तथा सुअर भोजन पा सकते हैं तो क्या कृष्ण हमारे भोजन का भी प्रबन्ध नहीं करेंगे? यदि हम पूरी तरह कृष्णभावनाभावित हों और उनकी सेवा करते हों। क्या कृष्ण कृतघ्न हैं? नहीं।
  भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं, “हे अर्जुन! मैं सबों पर समभाव रखता हैं। किसी से ईर्ष्या नहीं करता, और न ही कोई मेरा विशेष मित्र है किन्तु जो कृष्णभक्ति में लगा रहता है उसका मैं विशेष ध्यान रखता हूँ। चूंकि एक छोटा बालक अपने माता-पिता पर पूरी तरह आश्रित रहता हैं अतएव वे उस बालक पर विशेष ध्यान रखते हैं। यद्यपि माता-पिता सारे बालकों पर समान रूप से दयालु होते हैं किन्तु ये छोटे छोटे बालक, जो सदैव "माँ, माँ” चिलाते रहते हैं, उनपर विशेष ध्यान दिया जाता है। “क्या है मेरे लाल?" हाँ। यह स्वाभाविक हैं।
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रविवार, 30 सितंबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (हम अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं)

  
हम अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं
अतएव हमें अपनी इन्द्रियों को भौतिक सुख बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के इच्छुक न बनकर कृष्णभावनामृत का अभ्यास करके आध्यात्मिक सुख पाने का प्रयास करना चाहिए। जैसा कि प्रह्लाद महाराज कहते हैं, "यद्यपि इस मानव शरीर में तुम्हारा जीवन क्षणिक हैं किन्तु है अत्यन्त मूल्यवान । अतएव अपने भौतिक इन्द्रियभोग को बढ़ाने का प्रयास करने की अपेक्षा तुम्हारा कर्तव्य होता है कि अपने कायों को किसी न किसी तरह कृष्णभावनामृत से जोड़ा। - मनुष्य शरीर से ही उच्चतर बुद्धि आती है। चूंकि हमें उच्चतर चेतना मिली है इसलिए जीवन में हमें उच्चतर आनन्द के लिए प्रयत्न करना चाहिए यह आध्यात्मिक आनन्द है। इस आध्यात्मिक आनन्द को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान् की सेवा में लीन रहे क्योंकि वे ही भक्ति रूपी आनन्द प्रदान करने वाले हैं। हमें अपना ध्यान कृष्ण के चरणकमलों को प्राप्त करने में लगाना चाहिए जो हमें इस भौतिक जगत से उद्धार करने वाले हैं।
  किन्तु क्या हम इस जीवन में आनन्द नहीं ले सकते और अगले जीवन में कृष्ण की सेवा में अपने को लगा दें? प्रह्लाद महाराज का उत्तर है, "अब हम भौतिक पाश में हैं। इस समय मुझे यह शरीर मिला है किन्तु कुछ वर्षों बाद मैं यह शरीर त्याग कर अन्य शरीर धारण करने के लिए बाध्य होऊँगा। एक बार एक शरीर पा लेने पर तथा अपने शरीर की इन्द्रियों के आदेशानुसार भोग करने पर हम दूसरे शरीर के लिए तैयार होते हैं और यह दूसरा शरीर अपनी इच्छा के अनुसार प्राप्त करते हैं।" इसकी कोई गारंटी नहीं हैं कि आपको मनुष्य शरीर ही मिले| यह तो आपके कर्म पर निर्भर करेगा। यदि आप देवता की तरह कर्म करेंगे तो आपको देवता का शरीर प्राप्त होगा और यदि आप कुत्ते की तरह कर्म करेंगे तो कुत्ते का शरीर मिलेगा। मृत्यु के समय आपका भाग्य आपके हाथ में नहीं होता यह प्रकृति के हाथ में होता है। यह हमारा धर्म नहीं की हम यह सोचें कि हमें गला कौन सा शरीर मिलेगा। इस समय तो हम इतना ही समझ ले कि यह मनुष्य शरीर हमारी आध्यात्मिक चेतना, हमारे कृष्णभावनामृत को विकसित करने का अच्छा सुअवसर है। इसलिए हमें तुरन्त कृष्ण की सेवा में जुट जाना चाहिए। तभी हम प्रगति कर सकेंगे।
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शनिवार, 29 सितंबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (सर्वप्रिय पुरुष)

सर्वप्रिय पुरुष
  इस भौतिक जगत में जीव एक आध्यात्मिक प्राणी है, किन्तु उसमें आनन्द लूटने की भौतिक शक्ति का उपयोग करने की प्रवृत्ति होती है इसलिए उसे शरीर प्राप्त हुआ है। जीवों की ८४ लाख योनियाँ हैं। और हर योनि का पृथक शरीर है। शरीर के अनुसार ही उनमें विशिष्ट इन्द्रियाँ होती हैं जिनसे वे किसी विशेष आनन्द को भोग सकते हैं। मान लीजिये कि आपको एक कैंटीली झाड़ी दे दी जाय और कहा जाय, देवियो और सज्जनो! यह अत्युत्तम भोजन है। यह ऊँटों द्वारा प्रमाणित है। यह अति उत्तम है।” तो क्या आप इसे खाना पसन्द करेंगे? "नहीं, आप यह क्या व्यर्थ की वस्तु मुझे दे रहे हैं? आप कहेंगे चूँकि आपको ऊँट से भिन्न शरीर मिला हुआ है अतएव आपको कैंटीली झाड़ी नहीं भाती। किन्तु यही झाड़ी ऊँट को दे दी जाय तो वह सोचेगा कि यह तो अत्युत्तम आहार है।
  यदि सुअर तथा ऊँट बिना किसी विकट संघर्ष के इन्द्रियतृप्ति का भोग कर सकते हैं तो हम मानव प्राणी क्यों नहीं कर सकते? हम कर सकते हैं किन्तु यह हमारी चरम उपलब्धि नहीं होगी चाहे वह सुअर हो या ऊँट अथवा मनुष्य, इन्द्रियतृप्ति भोगने की सुविधाएँ प्रकृति द्वारा प्रदान की जाती हैं। अतएव वे सुविधाएँ जो आपको प्रकृति के नियम द्वारा मिलनी है उनके लिए आप श्रम क्यों करें ? प्रत्येक योनि में शारीरिक माँगों की तुष्टि प्रकृति द्वारा व्यवस्थित होती है। इस तृप्ति की व्यवस्था उसी तरह की जाती है जिस तरह दुःख की व्यवस्था रहती है। क्या आप चाहेंगे कि आपको ज्वर चढ़े? नहीं। ज्चर क्यों चढ़ता है? मैं नहीं जानता। किन्तु यह चढ़ता है, है न! क्या आप इसके लिए प्रयास करते हैं? नहीं। तो यह चढ़ता कैसे है? प्रकृति से। यही एकमात्र उत्तर है। यदि आपका कष्ट प्रकृति द्वारा प्रदत्त है तो आपका सुख भी प्रकृतिजन्य है। इसके विषय में चिन्ता मत करें। यही प्रस्ताव महाराज का आदेश है। यदि आपको बिना प्रयास के ही जीवन में कष्ट मिलते हैं तो सुख भी बिना प्रयास के प्राप्त होगा।  तो इस मनुष्य जीवन का असली प्रयोजन क्या है? “कृष्णभावनामृत का अनुशीलन।” अन्य सारी वस्तुएँ प्रकृति के नियमों द्वारा, जो कि अन्ततः ईश्वर का नियम है, प्राप्त हो जायेंगी। यदि मैं प्रयास न भी करूं तो मुझे अपने विगत कर्म तथा शरीर के कारण, जो भी मिलना है, वह प्रदान किया जायेगा। अतएव आपकी असली चिन्ता मनुष्य जीवन के उच्चतर लक्ष्य को खोज निकालने की है।
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शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (सर्वप्रिय पुरुष)

सर्वप्रिय पुरुष
  यह आत्मा क्या है? यह आत्मा भगवान् का अंश है। जिस तरह हम हाथ या अँगुली की रक्षा करना चाहते हैं क्योंकि वह पूरे शरीर का अंग है, उसी तरह हम अपने को बचाना चाहते हैं क्योंकि यही भगवान् की रक्षा विधि है। भगवान् को रक्षा की आवश्यकता नहीं होती किन्तु यह तो उनके प्रति हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति है जो अब विकृत हो चुकी है। अंगुली तथा हाथ सारे शरीर के हितार्थ काम करने के लिए हैं। जैसे ही मैं चाहता हूँ कि मेरा हाथ यहाँ आये तो वह तुरन्त आ जाता है और ज्योंही मैं चाहता हूँ कि अँगुली ढोल बजाये, वह बजाने लगती है। यह प्राकृतिक स्थिति है। इसी तरह हम अपनी शक्ति को भगवान् की सेवा में लगाने के लिए ईश्वर की खोज करते हैं किन्तु माया के जादू के कारण हम इसे जान नहीं पाते । यही हमारी भूल है। मनुष्य जीवन में हमें यह सुयोग मिला है कि हम अपनी वास्तविक स्थिति को समझें । चूँकि आप सभी मानव प्राणी हैं। इसीलिए कृष्णभावनामृत सीखने यहाँ आये हैं जो कि आपके जीवन का असली लक्ष्य है। मैं कुत्ते-बिल्लियों को यहाँ बैठने के लिए नहीं बुला सकता। यही अन्तर है मानव प्राणियों तथा कुत्ते-बिल्लियों में । मानव प्राणी जीवन के असली लक्ष्य को प्राप्त करने की आवश्यकता समझ सकता है। किन्तु यदि वह इस सुअवसर को हाथ से जाने देता है तो इसे महान् अनर्थ समझना चाहिए।
   प्रह्लाद महाराज कहते हैं, “ईश्वर सर्वाधिक प्रिय पुरुष हैं । हमें उनकी खोज करनी चाहिए | तब जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के विषय में क्या होगा? प्रह्लाद महाराज उत्तर देते हैं, “तुम लोग इन्द्रियतृप्ति के पीछे पड़े हो किन्तु इन्द्रियतृप्ति तो इस शरीर के संसर्ग से स्वतः ही हो जाती है।” चूँकि सुअर को एक शरीर मिला है। अतएव उसकी इन्द्रियतृप्ति मल भक्षण से होती है जो आप सबों के लिए सबसे घृणित वस्तु है। आप दुर्गन्ध से बचने के लिए शौच के तुरन्त बाद वहाँ से चल देते हैं लेकिन सुअर प्रतीक्षा करता रहता हैं । ज्योंही आप शौच कर चुकते हैं वह तुरन्त उसका आनन्द उठाता है। अतएव शरीर के विविध प्रकारों के अनुसार इन्द्रियतृप्ति भिन्न भिन्न होती है । इन्द्रियतृप्ति प्रत्येक देहधारी को होती है। ऐसा कभी मत सोचें कि मल खाने वाले सुअर दुखी हैं। नहीं। वे इस तरह से मोटे बनते हैं। वे अत्यन्त सुखी है। दूसरा उदाहरण ऊँट का है। ऊँट कंटीली झाड़ियों का शौकीन होता है। क्यों? क्योंकि जब वह कंटीली झाड़ियाँ खाता है तो झाड़ियाँ उसकी जीभ को काट देती हैं, जिससे रक्त चूने लगता हैं और वह अपने ही रक्त का आस्वादन करता है। तब वह सोचता है, “मैं आनन्द पा रहा हूँ।” यही इन्द्रियतृप्ति है। यौन जीवन भी ऐसा ही हैं। हम अपने ही रक्त का आस्वादन करते हैं और सोचते हैं कि आनन्द लूट रहे हैं। यही हमारी मूर्खता है।
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गुरुवार, 27 सितंबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (सर्वप्रिय पुरुष)

सर्वप्रिय पुरुष
  आत्मा शब्द का मोटा अर्थ शरीर है किन्तु सूक्ष्म अर्थ में मन या बुद्धि ही आत्मा है। स्थूल अवस्था में हम अपने शरीर की रक्षा करने तथा उसे तुष्ट करने में अत्यधिक रुचि लेते हैं किन्तु सूक्ष्मतर अवस्था में हम मन तथा बुद्धि को तुष्ट करने में रुचि लेते हैं। किन्तु मानसिक तथा बौद्धिक लोकों के ऊपर, जहाँ का वातावरण आध्यात्मीकृत है।
हम यह समझ सकते हैं कि अहं ब्रह्मास्मि अर्थात् “मैं यह मन-बुद्धि या शरीर नहीं हैं-मैं तो आत्मा हूँ भगवान् का भिन्नांश ।" यही है। असली समझ या ज्ञान का स्तर या पद।
   प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि समस्त जीवों में से विष्णु परम हितैषी हैं। इसलिए हम सभी उनकी खोज में लगे हैं। जब बालक रोता है तो वह क्या चाहता है? अपनी माता । किन्तु इसे व्यक्त करने के लिए उसके पास कोई भाषा नहीं होती। स्वभावतः उसका शरीर उसकी माता के शरीर से उत्पन्न होता हैं अतएव अपनी माता के शरीर से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। बालक अन्य किसी स्त्री को नहीं चाहेगा। बालक रोता है किन्तु जब वह स्त्री, जो बालक की माँ होती है, आती है और उसे गोद में उठा लेती है तो वह बालक चुप हो जाता है। यह सब व्यक्त करने के लिए उसके पास कोई भाषा नहीं होती किन्तु अपनी माता से उसका सम्बन्ध प्रकृति का नियम है। इसी तरह हम स्वभावतः शरीर की रक्षा करना चाहते हैं। यह आत्मसंरक्षण हैं। यह जीव का प्राकृतिक नियम है जिस प्रकार भोजन एक प्राकृतिक नियम है और सोना भी प्राकृतिक नियम है । तो मैं शरीर की रक्षा क्यों करूँ? क्योंकि इस शरीर के भीतर आत्मा हैं।
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