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शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (पारिवारिक मोह)

पारिवारिक मोह
श्रीमद्भागवत द्वारा यह पुष्टि होती है कि भौतिक भोग नर तथा नारी के यौन-मिलाप से अधिक कुछ नहीं है। प्रारम्भ में कोई लड़का सोचता है, “वाह! वह लड़की कितनी सुन्दर है” और लड़की कहती है कि लड़का उत्तम है। जब वे मिलते हैं तो भौतिक प्रदूषण अधिक स्पष्ट हो जाता है। और जब वे यौन का आनन्द लूटते हैं तो वे पूरी तरह लिप्त हो जाते हैं। सो कैसे? जैसे ही लड़का तथा लड़की विवाहित हो जाते हैं वे एक कमरा चाहते हैं। फिर उनके बच्चे उत्पन्न होते हैं। तब उनके भी बच्चे होते हैं। जब बच्चा जन्म ले लेता है तो वे सामाजिक मान्यता समाज, मैत्री तथा प्रेम चाहते हैं। इस तरह भौतिक अनुराग बढ़ता जाता है। इन सब में पैसा खर्च होता है। जो व्यक्ति अतीव भौतिकतावादी होता है वह किसी को भी ठग सकता है, किसी का भी वध कर सकता है, रुपया माँग सकता है,उधार ले सकता है या चुरा सकता है, कोई भी बात जो धन ला सके कर सकता है। वह जानता है कि उसका घर, उसका परिवार, उसकी पत्नी और बच्चे सदा सदा विद्यमान नहीं रहेंगे । वे समुद्र के बुलबुले के समान हैं जो उत्पन्न होते हैं और थोड़ी देर में चले जाते हैं। किन्तु वह अत्यधिक अनुरक्त रहता है। धन की खोज के वास्ते वह अपने आध्यात्मिक विकास की बलि कर देता है। "मैं यह शरीर हूँ। मैं इस भौतिक जगत का हूँ। मैं इस देश का हैं. मैं इस जाति का हैं, मैं इस धर्म का हूँ और मैं इस परिवार से सम्बन्धित हूँ।” यह विकृत चेतना बढ़ती ही जाती है। उसका कृष्णभावनामृत कहाँ है? वह इस हद तक फँस जाता है कि उसके लिए धन अपने जीवन से भी अधिक मूल्यवान बन जाता है। चाहे कोई गृहस्थ हो, या श्रमिक, व्यापारी हो या चोर-डकैत, या धूर्त हर व्यक्ति धन के पीछे लगा हुआ हैं। यही मोह है। इस बन्धन में वह अपने को विनष्ट कर देता है।
प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि इस अवस्था में, जब आप भौतिकतावाद में अत्यधिक लीन हों तो आप कृष्णभावनामृत का अनुशीलन नहीं कर सकते । इसलिए बालपन से ही कृष्णभावनामृत का अभ्यास करना चाहिए । निस्सन्देह चैतन्य महाप्रभु इतने दयालु हैं कि वे कहते हैं, “कल करे सो आज कर" यद्यपि तुम अपने बालपन से ही कृष्णभावनामृत को शुरू करने से चूक गये हो, किन्तु तुम जैसी भी स्थिति में हो उसे अभी से शुरू कर दो। यही चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा है। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि चूंकि तुमने अपने बचपन से कृष्णभावनामृत नहीं शुरू किया इसलिए तुम उन्नति नहीं कर सकते। वे अत्यन्त कृपालु हैं। उन्होंने हमें यह उत्तम हरे कृष्ण कीर्तन प्रदान किया है, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । आप चाहे जवान हों या बूढ़े चाहे आप जो भी हों, बस इसे शुरू कर दें। आप यह नहीं जानते कि आपका जीवन कब समाप्त हो जायेगा। यदि आप निष्ठापूर्वक क्षणभर के लिए भी कीर्तन करते हैं तो इसका बहुत प्रभाव पड़ेगा। यह आपको महान से महान संकट से, अगले जीवन में पशु बनने से बचा लेगा।
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शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (पारिवारिक मोह)

पारिवारिक मोह
  प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि हर व्यक्ति पारिवारिक स्नेह से बँधा है। जो व्यक्ति पारिवारिक मामलों में अनुरक्त रहता है वह अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर सकता। स्वभावतः हर व्यक्ति किसी न किसी से प्रेम करना चाहता है। उसे समाज, मैत्री तथा प्रेम की आवश्यकता होती है। ये आत्मा की माँगे हैं किन्तु वे विकृत रूप में प्रतिबिम्बित होती हैं। मैंने देखा है कि आपके देश के अनेक पुरुषों तथा स्त्रियों का कोई पारिवारिक जीवन नहीं है, बल्कि उन्होंने अपना प्रेम कुत्तो-बिल्लियों पर स्थापित कर रखा है क्योंकि वे किसी न किसी से प्रेम करना चाहते हैं। किन्तु किसी को भी उपयुक्त न पाकर कुत्ते बिल्लियों से प्रेम करने लगते हैं। हमारा कार्य है इस प्रेम को, जिसे कहीं न कहीं स्थापित करना है, कृष्ण पर स्थानान्तरित करना। यही कृष्णभावनामृत है। यदि आप अपने प्रेम को कृष्ण पर स्थानान्तरित करते हैं तो यह सिद्धि है। किन्तु आजकल लोग विचलित हैं तथा ठगे हुए हैं अतएव उन्हें इसका ज्ञान नहीं रहता कि वे अपना प्रेम कहाँ स्थापित करें अतः अन्त में वे कुत्ते-बिल्लियों पर अपना प्रेम स्थापित करते हैं।
  हर व्यक्ति भौतिक प्रेम से जकड़ा हुआ हैं । भौतिक प्रेम में बहुत आगे बढ़ जाने पर आध्यात्मिक जीवन विकसित कर पाना बहुत कठिन हैं क्योंकि यह प्रेम का बन्धन अत्यन्त बलशाली होता है। इसलिए प्रह्लाद महाराज प्रस्ताव रखते हैं कि मनुष्य को बाल्य काल से ही कृष्णभावनामृत सीखना चाहिए। जब बालक पाँच-छः वर्ष का हो जाता है जैसे ही उसकी चेतना विकसित हो जाती है उसे प्रशिक्षण पाने के लिए पाठशाला भेज दिया जाना चाहिए। प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि उसकी शिक्षा को प्रारम्भ से ही कृष्णभावनामावित होना चाहिए। पाँच से लेकर पन्द्रह वर्ष तक की अवधि अत्यन्त मूल्यवान होती है। आप किसी भी बालक को कृष्णभावनामृत का प्रशिक्षण दे सकते हैं और वह इसमें सिद्ध हो जायेगा। | बालक यदि कृष्णभावनामृत में प्रशिक्षित नहीं रहता और उल्टे वह भौतिकतावाद में प्रगति कर लेता है तो उसके लिए आध्यात्मिक जीवन विकसित कर पाना कठिन है। यह भौतिकतावाद क्या है? भौतिकतावाद का अर्थ है कि इस जगत में हम सारे लोग, आत्माएँ होते हुए भी इस जगत में आनन्द लूटना चाहते हैं। आनन्द आध्यात्मिक जगत में अपने शुद्ध रूप में विद्यमान रहता है। किन्तु हम यहाँ कलुषित आनन्द में हिस्सा बँटाने आये है। जिस तरह मधुशाला का हर व्यक्ति सोचता है कि वह कुछ शराब पीकर आनन्द भोग सकता है। भौतिक भोग का मूल सिद्धान्त यौन है। इसलिए उसे यौन न केवल मानव समाज में मिलेगा अपितु बिल्ली समाज, कुत्ता समाज, पक्षी समाज सर्वत्र ही यौन मिलेगा। दिन में कबूतर कम से कम बीस बार संभोग करता है। यही उसका आनन्द है।
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गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (पारिवारिक मोह)

पारिवारिक मोह
  प्रहलाद महाराज ने अपने मित्रों को बतलाया, “तुम्हें तुरन्त ही कृष्णभावनामृत शुरू कर देना चाहिए।” सारे बालक नास्तिक भौतिकतावादी परिवारों में जन्में थे किन्तु सौभाग्यवश उन्हें प्रहलाद की संगति प्राप्त थी जो अपने जन्म से ही भगवान के महान भक्त थे। जब भी उन्हें अवसर मिलता, और जब अध्यापक कक्षा के बाहर होता तो वे कहा करते, "मित्रो! आओ, हम हरे कृष्ण कीर्तन करें। यह कृष्णभावनामृत शुरू करने का समय है।"
    किन्तु जैसा कि हमने अभी अभी कहा, किसी बालक ने कहा होगा, “किन्तु हम अभी बच्चे हैं। हमें खेलने दीजिये । हम तुरन्त मरने वाले नहीं, अतः बाद में कृष्णभावनामृत शुरू करेंगे।” लोग यह नहीं जानते कि कृष्णभावनामृत सर्वोच्च आनन्द है। वे सोचते हैं कि जो बालक तथा बालिकाएँ इस कृष्णभावनामृत में सम्मिलित हुए हैं। वे मूर्ख हैं। ये प्रभुपाद के प्रभाव से इसमें सम्मिलित हुए हैं और उन्होंने भोगने योग्य अपनी सारी वस्तुएँ छोड़ दी हैं। किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। वे सभी बुद्धिमान, शिक्षित बालक बालिकाएँ हैं और अत्यन्त सम्मानित परिवारों से आए हैं। वे मूर्ख नहीं हैं। वे हमारे संघ में सचमुच ही जीवन का आनन्द ले रहे हैं अन्यथा इस आन्दोलन के लिए वे अपना मूल्यवान् समय अर्पित न कर देते। वस्तुतः कृष्णभावनामृत में आनन्दमय जीवन बीतता है लेकिन लोगों को इसका पता नहीं है। वे कहते हैं, “इस कृष्णभावनामृत से क्या लाभ है?” जब मनुष्य इन्द्रियतृप्ति में फँसकर बड़ा होता है तो उसमें से निकल पाना बहुत कठिन होता है। इसलिए वैदिक नियमों के अनुसार पाँच वर्ष की अवस्था से ही विद्यार्थी जीवन में बालकों को आध्यात्मिक जीवन के विषय में शिक्षा दी जाती हैं। इसे ब्रह्मचर्य कहते हैं | एक ब्रह्मचारी परम चेतना कृष्णभावनामृत या ब्रहा अनुभूति प्राप्त करने में अपना सारा जीवन अर्पित कर देता है। । ब्रह्मचर्य के अनेक विधि-विधान हैं। उदाहरणार्थ, किसी का पिता कितना ही धनी क्यों न हो, एक ब्रह्मचारी अपने गुरु के निर्देशन में प्रशिक्षित होने के लिए उसकी शरण में एक दास की तरह आता है। यह कैसे सम्भव है? हमें इसका वास्तविक अनुभव हो रहा है कि अत्यन्त सम्मानित परिवारों के बहुत ही अच्छे बालक यहाँ पर किसी भी तरह का कार्य करने में संकोच नहीं करते। वे थालियाँ धोते हैं, फर्श साफ करते हैं, वे हर कार्य करते हैं। एक शिष्य की माता को अपने बेटे पर आश्चर्य हुआ, जब उसने घर का दौरा किया। इसके पूर्व वह दुकान तक भी नहीं जाता था किन्तु अब वह चौबीसों घन्टे काम में लगा रहता है। जब तक आनन्द की अनुभूति न हो, भला कोई व्यक्ति कृष्णभावनामृत जैसी विधि में क्यों कर लगने लगा? यह केवल हरे कृष्ण कीर्तन करने से ही है। यही हरेकृष्ण मन्त्र हमारी एकमात्र निधि है। मनुष्य एकमात्र कृष्णभावनामृत से प्रसन्न रह सकता हैं। वस्तुतः यह आनन्दपूर्ण जीवन है। किन्तु बिना प्रशिक्षित हुए ऐसा जीवन बिताया नहीं जा सकता।
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बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (हम अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं)

हम अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं
  साधारण व्यक्ति बालपन को खेल में बिताता हैं। आप बीस वर्षों तक इसी तरह करते रह सकते हैं। तत्पश्चात् जब आप वृद्ध होते" हैं, तो फिर से बीस वर्षों तक कुछ नहीं कर सकते। जब व्यक्ति वृद्ध हो जाता है तो उसकी इन्द्रियाँ काम नहीं कर सकतीं। आपने अनेक वृद्ध व्यक्तियों को देखा होगा, वे विश्राम करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं करते। अभी अभी हमें अपने एक शिष्य का पुत्र मिला है जिसमें सूचित किया गया है कि उसकी दादी को लकवा मार गया है और वह गत साढ़े तीन वर्षों से कष्ट भोग रही है। अतः वृद्धावस्था में अस्सी वर्ष की आयु पार करते ही सारा काम ठप्प हो जाता है। इसलिए प्रारम्भ से लेकर बीस वर्ष की आयु तक सारा का सारा समय नष्ट हो जाता है और यदि आप एक सौ वर्ष तक जीवित भी रहें, तो जीवन की अन्तिम अवस्था के और बीस वर्ष नष्ट हो जाते हैं। इस तरह आपके जीवन के चालीस वर्ष यों ही नष्ट हो जाते हैं। बीच की आयु में यौन-क्षुधा इतनी प्रबल होती है कि इसमें भी बीस वर्ष नष्ट हो जाते हैं। इस तरह बीस, फिर बीस, तब बीस कुल साठ वर्ष नष्ट हो जाते हैं। जीवन का विश्लेषण प्रह्लाद महाराज द्वारा दिया गया है। हम अपने जीवन को कृष्णभावनामृत में अग्रसर करने में न लगाकर उसे चौपट कर रहे हैं।
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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

प्रहलाद महाराज जी के उपदेश (हम अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं)

  
हम अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं
  यदि आप उन कृष्ण पर पूर्णतया आश्रित है, जो ८४ लाख योनियों के जीवों को भोजन प्रदान करते हैं, तो फिर वे आपको भोजन क्यों नहीं देगे? यह धारणा समर्पण का लक्षण हैं। किन्तु हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि कृष्ण मुझे भोजन दे रहे हैं अतः मैं अब सो || मापको बिना भय के कार्य करना है। आपको कृष्ण के लालन-पालन तथा संरक्षण पर पूरा विश्वास रखते हुए आप को कृष्णभावनामृत में पूरी तरह से लग जाना चाहिए। आइये हम अपनी आयु की गणना करें। इस युग में ऐसा कहा जाता है कि हम अधिक से अधिक एक सौ वर्ष जीवित रह सकते हैं। पहले सतयुग में लोग १ लाख वर्षों तक जीवित रहते थे। अगले युग त्रेता में वे १० हजार वर्षों तक जीते थे और उसके बाद वाले युग, द्वापर में १ हजार वर्षों तक। अब इस कलियुग में यह अनुमान १०० वर्ष का है। किन्तु ज्यों ज्यों कलियुग अग्रसर होता चलेगा, हमारी आयु और भी घटती जायेगी। यह हमारी आधुनिक सभ्यता की तथाकथित उन्नति हैं । हमें इसका बड़ा गर्व रहता है कि हम सुखी हैं और अपनी सभ्यता में सुधार ला रहे हैं। किन्तु इसका परिणाम यह है कि हम भौतिक जीवन का भोग करने का प्रयास तो करते हैं किन्तु हमारी आयु कम होती जा रही है।
  यदि हम यह मान लें कि एक मनुष्य एक सौ वर्षों तक जीवित रहता है और यदि उसे आध्यात्मिक जीवन का कोई ज्ञान नहीं है तो उसका आधा जीवन रात में सोने तथा सम्भोग करने में बीत जाता है। उसकी रुचि अन्य किसी कार्य में नहीं रहती। तो दिन के समय वह क्या करता है? “कहाँ है रुपया? कहाँ है रुपया? मुझे इस शरीर को बनाये रखना है ।" और जब उसके पास धन आ जाता है तो वह कहता है कि क्यों न मैं इसका उपयोग अपनी पत्नी और बच्चों पर करूँ? तो फिर उसकी आध्यात्मिक अनुभूति कहाँ रही? रात में वह अपना समय सोने में तथा संभोग करने में बिताता है और दिन में धन अर्जित करने के लिए वह कठोर श्रम करता है। क्या जीवन में उसका यही उद्देश्य है? ऐसा जीवन कितना भयावह है।
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